लौह मिस्र धातु आयात पर लगे सीमा शुल्क

11 फरवरी 2010, घरेलू लौह मिस्र धातु उत्पादकों ने इसके आयात पर सीमा शुल्क लगाए जाने की मांग की है। इस समय सस्ते आयात की वजह से घरेलू उत्पाद की मांग में जबरदस्त कमी आई है।

देश में 15000 करोड़ रुपये का कारोबार करने वाले इस उद्योग ने सस्ते आयात को रोकने के लिए इस पर 10 प्रतिशत सीमा शुल्क की मांग की है, जिससे सामान्य मूल्य स्तर पर कारोबार हो सके।

इस्पात मंत्रालय को बजट पूर्व दिए गए ज्ञापन में मुंबई के इंडियन फेरो एलॉय प्रोडयूसर्स एसोसिएशन ने कहा है कि सस्से लौह मिस्र धातु के आयात को रोकने के लिए यह जरूरी है कि सीमा शुल्क में बढ़ोतरी की जाए। हालांकि देश के ज्यादातर उत्पादकों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस संस्था ने फेरो निकल पर शुल्क शून्य रखने की मांग की है, जिसका पूरी तरह से आयात होता है।

उद्योग जगत के एक अधिकारी ने कहा, 'भारत में फेरो निकल का उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता। इसलिए अगर इस पर सीमा शुल्क बढाया जाता है तो पूरे स्टेनलेस स्टील उद्योग पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।'

मंत्रालय को भेजी गई सिफारिश में तर्क दिया गया है कि अगर कोई मानक स्टील उद्योग पर लागू होता है तो उसे बगैर किसी विभेद के लौह मिस्र धातु पर भी लागू किया जाना चाहिए, क्योंकि लौह मिस्र धातु स्टील का कच्चा माल है। इस तरह से लौह मिस्र धातु उद्योग को भी स्टील उद्योग की तरह ही मानकर उसे सुविधाएं दी जानी चाहिए।

यह उद्योग लंबे समय से अपनी क्षमता के 65 प्रतिशत पर काम कर रहा है। लेकिन मंदी की वजह से वैश्विक और घरेलू बाजारों में स्थिति और खराब हुई है और तमाम उत्पादकों को उत्पादन बंद करना पड़ा है या क्षमता घटाकर 25 प्रतिशत तक करनी पड़ी है।

उच्च आयात शुल्क से दो उद्देश्य पूरा होगा- पहला, घरेलू उद्योग को संरक्षण मिलेगा और दूसरा, सरकार को शुल्क संग्रह से ज्यादा राजस्व की प्राप्ति होगी। एसोसिएशन के महासचिव टीएस सुंदरेषन ने कहा कि लो ऐश लो फोस मैटलर्जिकल कोक का आयात ज्यादा दाम पर होता है, क्योंकि घरेलू बाजार में यह उपलब्ध नहीं है।

इस उद्योग को वैश्विक बाजार के बराबर का कारोबार करने के लिए विद्युत की आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर करनी चाहिए। बिजली का बिल अन्य देशों में लौह मिस्र धातु उत्पादकों को मिलने वाली बिजली की तुलना में 3-5 गुना ज्यादा है।

इस बोझ के चलते घरेलू उत्पादक पिछड़ जाते हैं और विदेशी उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहन मिलता है और वे बहुत कम दाम पर अपने माल भारत में भेजते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि इसके आयात पर शुल्क बढ़ाकर 5 प्रतिशत से 10 प्रतिशत किया जाए।

सीमा शुल्क में कमी किए जाने के साथ लौह मिस्र धातु के आयात में बढ़ोतरी हुई है। 2003-04 में जब आयात शुल्क 25 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत किया गया तो आयात बढ़कर 263 करोड़ रुपये का हो गया। 2004-05 में आयात शुल्क 15 प्रतिशत किए जाने पर आयात बढ़कर 479.3 करोड़ रुपये का हो गया।

उसके बाद 2005-06 में जब आयात शुल्क घटाकर 10 प्रतिशत किया गया तो आयात बढ़कर 591.3 करोड़ रुपये का हो गया। 2006-07 में आयात शुल्क 7.5 प्रतिशत किए जाने पर आयात बढ़कर 779.8 करोड़ रुपये का हो गया। इसके बाद 20007-08 में आयात शुल्क कम करके 5 प्रतिशत पर लाया गया तो आयात बढ़कर 1089.4 करोड़ रुपये का हो गया।

उसके अगले साल आयात अप्रैल दिसंबर 2008 में बढ़कर 1301.4 करोड़ रुपये का हो गया, जब आयात शुल्क शून्य कर दिया गया। इस तरह से देखें तो 5 साल और 9 महीनों में कुल 4504.2 करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा में बदल गया। अगर घरेलू उत्पादन को महत्व दिया जाए तो इससे बचा जा सकता है।

साथ ही इससे घरेलू उत्पादन क्षमता का समुचित उपयोग भी हो सकेगा और सरकार पर बोझ भी कम होगा। वर्तमान में 61 प्रतिशत क्षमता के इस्तेमाल के साथ देश में 22.2 लाख टन लौह मिस्र धातु का उत्पादन हर साल होता है। (स्रोत-बिजनेस स्टैंडर्ड)

घोषणा | गोपनीयता नीति | सर्वाधिकार सुरक्षित. © 2006-2010 एमजंक्शन सर्विसेस लिमिटेड