लघु उद्योग क्षेत्र में बह रही है बदलाव की ताजा बयार

30 जुलाई 2010, देश के सूक्ष्म, छोटे और मझोले कारोबार (एमएसएमई) के क्षेत्र में इन दिनों बदलाव की बयार बह रही है।

पहले, शेयर बाजार नियामक सेबी ने एसएमई प्लेटफार्म पर कारोबार के लिए अधिसूचित दिशा निर्देश जारी किए जिसकी वजह से एसएमई की लिस्टिंग आसान हो जाएगी। फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो ऐंड स्माल ऐंड मीडियम इंटरप्राइजेज (एफआईएसएमई) ने एक बैंकरप्टी कानून पर काम करना शुरू किया है जो देश में एमएसएमई के क्षेत्र में लंबे अरसे से काम कर रहे लेकिन कमोबेश नाकारा हो चुके तंत्र का स्थान लेगा।

इसके अलावा एफआईएसएमई इनके लिए एक प्रतिस्पर्धा संबंधी ढांचा तैयार करने पर भी काम कर रहा है जो इन उद्यमों को सुझाएगा कि देश के नए प्रतिस्पर्धा आयोग का फायदा किस तरह उठाया जाए। तमाम जरूरतों के चलते लागत ऊंची हो जाने के कारण अधिकांश एसएमई के लिए शेयर बाजारों से राशि एकत्रित करना कठिन हो जाता है। इसके अलावा अगर अपने मनपसंद समय पर आसानी से बाहर निकलने की सुविधा न हो तो ऐसे में ऐंजल इन्वेस्टर, वेंचर कैपिटल या निजी इक्विटी फंड भी इनमें निवेश करने में रुचि नहीं दिखाते।

इसलिए सेबी द्वारा मई 2010 में शेयरों की लिस्टिंग के मानकों में ढील की घोषणा और पूर्व में एसएमई के लिए अलग प्लेटफार्म निर्मित करने की घोषणा के बाद एसएमई के लिए शेयर बाजारों में प्रवेश करना कुछ आसान हो जाएगा। ये नए मानक उन एसएमई की अनुपालन लागत कम करेंगे जो बाजार में लिस्ट होना चाहती हैं।
सेबी के मुताबिक जो एसएमई लिस्टेड हैं उन्हें अपने वित्तीय नतीजे तिमाही आधार पर जमा या घोषित नहीं करने होंगे जबकि बीएसई और एनएसई जैसे प्रमुख शेयर बाजारों में लिस्टेड कंपनियों को ऐसा करना पड़ता है।

इसके अलावा उन्हें अपने निवेशकों को सालाना रिपोर्ट भी नहीं भेजनी होगी। इसके बजाय, एसएमई प्लेटफॉर्म पर बिजनेस ट्रेडिंग करने वालों को छमाही आधार पर अपने वित्तीय नतीजे घोषित करने होंगे, वे इन्हें अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित कर सकते हैं और इसके मुख्य बिंदुओं को शेयर धारकों को भेज सकते हैं।

हालांकि इसके अलावा उन पर लिस्टेड कंपनियों वाली सभी शर्तें लागू होंगी। उदाहरण के लिए उन्हें न्यूनतम 25 फीसदी की पब्लिक होल्डिंग करनी होगी। एसएमई खंड में लिस्टिंग की चाह रखने वाली कंपनी के लिए पूंजी में से 25 करोड़ रुपये की फेस वैल्यू की ऊपरी सीमा तय की गई है। इस खंड में लिस्टेड कंपनियां यदि इश्यू के बाद 25 करोड़ रुपये की सीमा पार करती हैं तो उनको आवश्यक रूप से मुख्य विनिमय बोर्ड में स्थानांतरित किया जाएगा।

दूसरे देशों में एसएमई को लिस्टिंग के लिए प्लेटफॉर्म मुहैया कराने का यह फायदा देखा गया है कि इससे छोटी कंपनियों को शेयर बाजार में लाने में मदद मिलती है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण है लंदन स्टॉक एक्सचेंज का वैकल्पिक निवेश बाजार। भारत में पहले हुए ऐसे प्रयास (ओटीसीईआई और बीएसई का इंडोनेक्स्ट) नकदी की कमी और निवेशकों की रुचि न होने के कारण असफल साबित हुए हैं लेकिन इस नवीनतम प्रयास का फायदा यह है कि इस बार नियम कायदे ढीले रखे गए हैं।

एफआईएसएमई के महासचिव अनिल भारद्वाज ने बताया कि 'कंपटीशन कमीशन फ्रेमवर्क इन इंडिया ऐंड एमएसएमईज' शीर्षक वाला एक अध्ययन इन दिनों चल रहा है और इसके अगस्त के मध्य तक पूरा हो जाने का अनुमान है। इस परियोजना को युनाइटेड नेशंस कान्फ्रेंस ऑन ट्रेड ऐंड डेवलपमेंट (यूएनसीटीएडी), उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय में वाणिज्य विभाग तथा ब्रिटेन सरकार के अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग (डीएफआईडी) की सहायता प्राप्त है। इसका उद्देश्य है एमएसएमई को यह बताना कि वे नए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) का फायदा कैसे उठा सकें।

भारद्वाज ने कहा कि एमएसएमई नई प्रतिस्पर्धी नीति के दौर में अपने अधिकारों और जवाबदेहियों से बड़े पैमाने पर अनजान रही हैं। सीसीआई ने कुछ ऐसी पहल करने का जिम्मा उठाया है कि सेमिनारों आदि के जरिए कुछ जागरुकता फैलाई जाए। उक्त अध्ययन के दो लक्ष्य हैं: पहला प्रतिस्पर्धा विरोधी गतिविधियों को उदाहरण के रूप में पेश करने के लिए सूची बनाना, एमएसएमई को ऐसी गतिविधियों की पहचान करने में मदद करना जो उनके कारोबार को प्रभावित करती हैं और उनकी कठिनाइयों को दूर करने के लिए कानून के मुताबिक उपचारात्मक सुविधा उपलब्ध कराना तथा इस संबध में कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करना।

दूसरा लक्ष्य है इस अध्ययन के जरिए एमएसएमई ,सीसीआई और शेयर धारकों को एजेंडा सुझाना ताकि देश की सार्वजनिक नीतियों में प्रतिस्पर्धी सिद्घांत लागू किए जा सकें। इस दौरान चार काम पूरे किए जाएंगे। पहला होगा एमएसएमई के लिहाज से देश और विदेशों में प्रतिस्पर्धा नीति संबंधी ढांचे का अध्ययन करना और इनमें से सर्वोत्तम का पता लगाना। इसके अलावा विदेशों में किसी ऐसी विशेष छूट का पता लगाना जो एमएसएमई के लिए हो। दूसरा, सार्वजनिक खरीद, कच्चे माल की आपूर्ति और सार्वजनिक नीतियों में ऐसी प्रतिस्पर्धा विरोधी गतिविधियों का वर्गीकरण करना जिनसे बड़े घरानों या कंपनियों के साथ कारोबार के दौरान एमएसएमई का पाला पड़ता है।

तीसरा होगा सीसीआई के अंतर्गत एमएसएमई के अधिकारों और विशेषाधिकारों का अध्ययन करना और उन उपायों का अध्ययन करना जिन्हें एमएसएमई गैर प्रतिस्पर्धी गतिविधियों से निपटने के दौरान इस्तेमाल कर सकते हैं। चौथा है एमएसएमई के दृष्टिकोण से इस क्षेत्र में काम कर रहे मौजूदा तंत्र - एजेंसियों, विशेषज्ञों, कानूनी फर्मों और सेवा प्रदाताओं की पहचान करना और यदि उनमें कोई कमी हो तो उसे खोज निकालना।

वैश्विक वित्तीय संकट के मद्देनजर बढ़ते संरक्षणवादी रुझानों और नतीजतन भारत में मंदी आने तथा भारतीय एमएसएमई की पहुंच को प्रतिस्पर्धी कीमत वाले कच्चे माल और सार्वजनिक खरीद तक सीमित कर दिए जाने ने इस मुद्दे पर तत्काल कार्रवाई को जरूरी बना दिया है। एफआईएसएमई का मानना है कि एमएसएमई से संबधित तीन ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

पहला तो यह कि कच्चे माल के बड़े उत्पादकों का समूह बनाना अक्सर एमएसएमई पर बुरा असर डालता है। इस क्षेत्र में निविदा आमंत्रण की पूर्व एवं पश्चात प्रक्रिया में कठोर अव्यावहारिक शर्तों की मदद से एमएसएमई को बाहर किया जा सकता है। तीसरा कुछ सेवाओं की आपूर्ति के क्षेत्र में कार्यकारी आदेशों की मदद से मोनोपॉली की जा सकती है जिन्हें एमएसएमई को बहुत अधिक कीमत पर या अव्यावहारिक परिस्थितियों में खरीदना पड़ेगा।

एमएसएमई मंत्रालय के अनुरोध पर एफआईएसएमई ने ऐसे संस्थानों के संबंध में दिवालियापन से संबंधित एक कानून का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू की है। जून में दिवालियेपन पर मंत्रालय के अधिकारियों और आर्थिक तथा विधिक विशेषज्ञों के बीच एक बैठक आयोजित हुई। इसमें एफआईएसएमई के महासचिव अनिल भारद्वाज भी शामिल हुए। बैठक में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि देश की 97 फीसदी एमएसएमई साझेदारी या प्रोपराइटरशिप के तहत हैं।

कारोबार में असफलता से पैदा हुए मुद्दों से तभी निपटा जा सकता है जबकि दिवालियेपन से संबधित एक आधुनिक कानून के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक तंत्र ऐसा हो जिसका भार वहन किया जा सके। इस बात पर भी सहमति प्रकट की गई कि प्रस्तावित कानून अमेरिकी बैंकरप्टी कोड से लिया जाए क्योंकि वह बहुत सरल और प्रभावी है, जबकि न्यायिक प्रक्रिया/प्रशासनिक तंत्र ब्रिटेन अथवा किसी यूरोपीय देश से लिया जाए ताकि वह एमएसएमईज से बहुत दूर केवल वकीलों के हाथों की चीज बनकर न रह जाए।

एक ओर जहां अमरचंद ऐंड मंगलदास सुरेश श्रॉफ ऐंड कंपनी की पल्लवी शाह कानून का मसौदा तैयार करने और प्रशासनिक तंत्र प्रस्तावित करने में मदद करेंगी वहीं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स (आईआईसीए) इस काम में शोध संबंधी सहायता उपलब्ध कराएंगे। अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय और लवीश भंडारी शोध टीम द्वारा चाही गई विशिष्टï जानकारी मुहैया कराएंगे।

एमएसएमई पर प्रधानमंत्री के कार्यबल के दिवालियेपन और एक्जिट संबंधी मुद्दों के उपसमूह के सदस्य एफआईएसएमई से कहा गया था कि वह एक ऐसे कानून की रूपरेखा तैयार करे जो प्रेसिडेंसी टाउन इन्सॉल्वेंसी ऐक्ट 1909 और प्रोविंसियल टाउन इन्सॉल्वेंसी ऐक्ट 1920 का स्थान ले सके। एफआईएसएमई के मुताबिक देश में इन्सॉल्वेंसी मैकेनिज्म इन्हीं दो कानूनों के सहारे चलता है और यह बेहद पुराना और कमोबेश अक्रिय हो चुका है।

इसके मुताबिक कंपनी अधिनियम के तहत जवाबदेही के जो सीमित प्रावधान हैं वे भी एमएसएमईज पर लागू नहीं होते क्योंकि देश की कुल एमएसएमईज में से 97 फीसदी या तो साझेदारी या फिर प्रोपराइटरशिप फम्र्स हैं। एफआईएसएमई के मुताबिक ऋणदाताओं के अधूरे भुगतान को सुनिश्चित करने के लिए देश में इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्टी संबंधी कानून अपरिहार्य हो चुका है।

ऐसे तंत्र के अभाव में जब भी कभी वित्तीय दबाव की स्थिति निर्मित होगी (स्वत: या जानबूझकर बनाई गई अस्थायी अथवा स्थायी) तो ऐसे में एमएसएमईज के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जिसके सहारे वे मल्टी एजेंसी क्रेडिटर्स (बैंकों के कर्ज और वित्तीय संस्थाओं समेत) के वाणिज्यिक और कानूनी जरूरतों से निपट सकें। चूंकि इनमें से कोई ऋण दाता पुर्नसंरचना की प्रक्रिया को रोक सकता है और इंटरप्राइजेज को बंद करवाने के अलावा कारोबारी के लिए जेल की सजा भी सुनिश्चित करवा सकता है।

देश में दिवालियेपन से निपटने के लिए कोई तंत्र नहीं है। इस संबंध में न तो कोई कानून है और न ही कोई विशिष्टï संस्था। एफआईएसएमई का तर्क है कि देश में इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्टी संबंधी बेहतर कानून होने पर कारोबारियों को यह सहूलियत होगी कि वे किसी कारोबार के असफल होने की स्थिति में इन कानूनों की सहायता से खुद को उससे अलग कर सकें।

प्रधानमंत्री के कार्यसमूह ने यह अनुशंसा की थी कि, 'पुराने पड़ चुके प्रोविंसियल इन्सॉल्वेंसी ऐक्ट, 1920 के स्थान पर छह महीने के भीतर एक आदर्श इन्सॉल्वेंसी ऐक्ट लागू करने की कोशिशें की जानी चाहिए जिसमें यूनिकॉरपोरेटेड फम्र्स के लिए समयबद्घ पुन: प्रवर्तन अथवा एक्जिट के प्रावधान होने चाहिए।' इसमें यह भी कहा गया था कि इस मॉडल अधिनियम में चार प्रमुख तत्वों का खास खयाल रखा जाना चाहिए। इनमें एक विशिष्ट अर्द्ध न्यायिक संस्था होनी चाहिए जो समयबद्घ पुन: प्रवर्तन अथवा क्लोजर की योजनाएं तैयार कर सके। कंपनी के पुन: प्रवर्तन संबंधी प्रावधानों को लागू कर सके।
(बिजनेस स्टैंडर्ड)

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